
प्रदोष व्रत का महत्व और विधि
सूर्योदय पंचांग के अनुसार प्रदोष 24 अक्तूबर 2026 को है। इस दिन शनि और बृहस्पति की कृपा से शत्रु बाधाएँ समाप्त होती हैं।
प्रदोष व्रत का महत्व और विधि
सूर्योदय पंचांग के अनुसार प्रदोष 24 अक्तूबर 2026 को है। इस दिन शनि और बृहस्पति की कृपा से शत्रु बाधाएँ समाप्त होती हैं और जीवन में शांति आती है।
प्रदोष का धार्मिक महत्व
प्रदोष को शिवजी की विशेष अनुदान प्राप्ति का दिन माना जाता है। आध्यात्मिक ग्रन्थों में कहा गया है कि इस दिन किए गए भक्ति कार्यों का फल शीघ्र मिलता है।
व्रत की विधि
व्रत रखने से पहले शुद्ध मन से स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए। सुबह के समय 06:27:42 पर सूर्य का उदय हुआ, जिसे लाहिरी (लहरी) के रूप में माना जाता है और इस क्षण में जय जयकारा किया जाता है।
- सात साज (संतरा, नारियल, फूल, दीया) की व्यवस्था करें।
- शिव प्रतिमा या लिंग की पूजा अर्पित करें।
- प्रदोष व्रत में उपवास रखें और फल, दूध, शाकाहारी व्यंजन ग्रहण करें।
- संध्या समय में अर्घ्य और परम पूजन करें।
प्रदोष दिवस के विशेष अभ्यर्थना
इस प्रदोष के दिन उठते ही शिव शंकर के मूलभूत मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। वैदिक गाथाओं के अनुसार, त्रिपुरारी के ध्वनि से मन की शुद्धि होती है। पूजन के पश्चात् गंगाजल से स्नान करें और व्रत का प्रयोग पूरी भक्ति के साथ समाप्त करें।
सम्पूर्ण मार्गदर्शन
प्रदोष व्रत का पालन करने वाले संकल्पित भक्त को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है। नियमित रूप से शुद्ध आहार और सकारात्मक चिंतन के साथ इस प्राचीन अनुष्ठान को अपनाएँ।
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