
Shri Ravidas Chalisa
श्री रविदास चालीसा
श्री रविदास चालीसा, महान संत रविदास जी को समर्पित एक भक्ति गीत है, जो उनके अद्वितीय जीवन और शिक्षाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। संत रविदास जी ने समाज में समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश फैलाया। यह चालीसा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और भक्तों को उनकी दिव्य कृपा प्राप्त करने में सहायता करती है। इस चालीसा का पाठ करने से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं। इसे नियमित रूप से पढ़ने से भक्ति में वृद्धि होती है और मन में सकारात्मकता का संचार होता है। यह चालीसा मानसिक तनाव को कम करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और जीवन में सुख-शांति लाने में सहायक होती है। भक्त इसे विशेष अवसरों पर, जैसे पूर्णिमा या रविदास जयंती पर, या अन्य धार्मिक अवसरों पर पढ़ सकते हैं। श्री रविदास चालीसा का पाठ करने के लिए एक शांत स्थान का चयन करें और ध्यानपूर्वक स्वच्छता का ध्यान रखें। इसे सुबह या शाम के समय पढ़ना विशेष प्रभावी माना जाता है। इस चालीसा के माध्यम से भक्त संत रविदास जी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख, समृद्धि, और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ा सकते हैं।
बंदौं वीणा पाणि को, देहु आय मोहिं ज्ञान।
पाय बुद्धि रविदास को, करौं चरित्र बखान॥
मातु की महिमा अमित है, लिखि न सकत है दास।
ताते आयों शरण में, पुरवहु जन की आस॥
॥ चौपाई ॥
जै होवै रविदास तुम्हारी।
कृपा करहु हरिजन हितकारी॥
राहु भक्त तुम्हारे ताता।
कर्मा नाम तुम्हारी माता॥
काशी ढिंग माडुर स्थाना।
वर्ण अछूत करत गुजराना॥
द्वादश वर्ष उम्र जब आई।
तुम्हरे मन हरि भक्ति समाई॥
रामानन्द के शिष्य कहाये।
पाय ज्ञान निज नाम बढ़ाये॥
शास्त्र तर्क काशी में कीन्हों।
ज्ञानिन को उपदेश है दीन्हों॥
गंग मातु के भक्त अपारा।
कौड़ी दीन्ह उनहिं उपहारा॥
पंडित जन ताको लै जाई।
गंग मातु को दीन्ह चढ़ाई॥
हाथ पसारि लीन्ह चौगानी।
भक्त की महिमा अमित बखानी॥
चकित भये पंडित काशी के।
देखि चरित भव भय नाशी के॥
रल जटित कंगन तब दीन्हाँ।
रविदास अधिकारी कीन्हाँ॥
पंडित दीजौ भक्त को मेरे।
आदि जन्म के जो हैं चेरे॥
पहुँचे पंडित ढिग रविदासा।
दै कंगन पुरइ अभिलाषा॥
तब रविदास कही यह बाता।
दूसर कंगन लावहु ताता॥
पंडित जन तब कसम उठाई।
दूसर दीन्ह न गंगा माई॥
तब रविदास ने वचन उचारे।
पडित जन सब भये सुखारे॥
जो सर्वदा रहै मन चंगा।
तौ घर बसति मातु है गंगा॥
हाथ कठौती में तब डारा।
दूसर कंगन एक निकारा॥
चित संकोचित पंडित कीन्हें।
अपने अपने मारग लीन्हें॥
तब से प्रचलित एक प्रसंगा।
मन चंगा तो कठौती में गंगा॥
एक बार फिरि परयो झमेला।
मिलि पंडितजन कीन्हों खेला॥
सालिग राम गंग उतरावै।
सोई प्रबल भक्त कहलावै॥
सब जन गये गंग के तीरा।
मूरति तैरावन बिच नीरा॥
डूब गईं सबकी मझधारा।
सबके मन भयो दुःख अपारा॥
पत्थर मूर्ति रही उतराई।
सुर नर मिलि जयकार मचाई॥
रह्यो नाम रविदास तुम्हारा।
मच्यो नगर महँ हाहाकारा॥
चीरि देह तुम दुग्ध बहायो।
जन्म जनेऊ आप दिखाओ॥
देखि चकित भये सब नर नारी।
विद्वानन सुधि बिसरी सारी॥
ज्ञान तर्क कबिरा संग कीन्हों।
चकित उनहुँ का तुम करि दीन्हों॥
गुरु गोरखहि दीन्ह उपदेशा।
उन मान्यो तकि संत विशेषा॥
सदना पीर तर्क बहु कीन्हाँ।
तुम ताको उपदेश है दीन्हाँ॥
मन महँ हार्योो सदन कसाई।
जो दिल्ली में खबरि सुनाई॥
मुस्लिम धर्म की सुनि कुबड़ाई।
लोधि सिकन्दर गयो गुस्साई॥
अपने गृह तब तुमहिं बुलावा।
मुस्लिम होन हेतु समुझावा॥
मानी नाहिं तुम उसकी बानी।
बंदीगृह काटी है रानी॥
कृष्ण दरश पाये रविदासा।
सफल भई तुम्हरी सब आशा॥
ताले टूटि खुल्यो है कारा।
माम सिकन्दर के तुम मारा॥
काशी पुर तुम कहँ पहुँचाई।
दै प्रभुता अरुमान बड़ाई॥
मीरा योगावति गुरु कीन्हों।
जिनको क्षत्रिय वंश प्रवीनो॥
तिनको दै उपदेश अपारा।
कीन्हों भव से तुम निस्तारा॥
॥ दोहा ॥
ऐसे ही रविदास ने, कीन्हें चरित अपार।
कोई कवि गावै कितै, तहूं न पावै पार॥
नियम सहित हरिजन अगर, ध्यान धरै चालीसा।
ताकी रक्षा करेंगे, जगतपति जगदीशा॥